दिव्यांग जनों की सेवा
हमारे देश में समस्याओं के विभिन्न रूप प्रतिशत दिखाई देते हैं विरोध प्रतिरूप छोटे-बड़े सूचना तथा व्यापक दोनों ही रूपों में देश के किसी ना किसी भाग में अवश्य दिखाई पड़ते हैं जाति प्रथा दहेज प्रथा सती प्रथा आदि ऐसी समस्याएं हैं जो समाज में अधिक से अधिक ग्रुप में इस प्रकार के समस्याओं से ग्रस्त होकर हमारा देश बहुत ही संकटग्रस्त है दूसरी ओर भिखारियों की समस्या विकलांगता की समस्या आदि छोटी और सुषमा समस्याओं से भी हमारे देश की स्थिति अवश्य बिगड़ी हुई दिखाई देती है स्पष्ट इसे विकलांगता हमारे देश की एक चर्चित और प्रमुख समस्या बन गई है
विकलांगता के कारण विकलांगता के कई कारण हो सकते हैं कोई भी व्यक्ति जन्म से भी विकलांग हो सकता है ।इसी तरह को भी व्यक्ति जन्म से बहरा गूंगा भी हो सकता है ।इस तरह विकलांगता ईश्वरी अभिशाप है ।इस दृष्टि से विकलांगता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर के स्वयं के समाधान के लिए एक चुनौती स्वरूप समस्या बनकर हमारे सामने खड़ी होकर हमें विवश कर रही है। विकलांगता के समाधान यह सार्वभौमिक सत्य है कि विकलांगता का समाधान तभी संभव है। जब हम इसके प्रति अपना पुरा दृष्टिकोण रखें इसके प्रति अपना नैतिक उत्तरदायित्व को निभाने के लिए दृढ़ संकल्प लें अपने निजी स्वार्थों को बलि देकर इसके समाधान की दिशा ढूंढे इस प्रकार विकलांगता को दूर करने के लिए हमें विकलांगों के प्रति स्वस्थ मानवीय दृष्टिकोण का परिचय देना पड़ेगा अपने हीन भावना को त्याग कर देना चाहिए विकलांगों में आत्मविश्वास को जलाना चाहिए उनके अनुभव देना चाहिए कि समाज के अधीन और अटूट उन्हें एक सामान्य जीवन जीने का मौलिक अधिकार है। वह समाज और राष्ट्र की सभी गतिविधियों और स्वरूपों के लिए उत्तरदाई बनकर अपनी उपलब्धियों से अपनी अद्भुत पहचान बनाने में सक्षम और योग्य है। विकलांगता दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि जो विकलांग है ।उन्हें ऐसे कार्य में लगाया जाए जैसे बहरा सुन तो नहीं सकता है, लेकिन देख सकता है। इसलिए उसे कोई निगरानी करने के काम में लगाया जाना चाहिए ,अंधे देख नही सकते पर सूत कात सकते हैं ।बोल सकते हैं ।अतः उन्हें इस तरह के कामों में लगा देना चाहिए इस तरह विकलांगों की योग्यता को कध्यान में रखकर उन्हें उनकी दुविधानुसार कामो में लगा कर विकलांगता के भयावह समस्या का हल ढूंढा जा सकता है।
